Sunday, July 18, 2010

अब हमारी भी विशिष्‍ट पहचान होगी

डॉलर, यूरोप के यूरो, जापान के येन ब्रिटिश पाउंड की तरह अब हमारे रुपएकी भी समूची दुनिया में विशिष् पहचान होगी। पिछले दिनों कैबिनेट ने इसफैसले पर अपनी मुहर लगाई तो खुशी हुई। लगा कि एक नामी अर्थशास्त्री केनेतृत् में हमारे मुल् की सरकार चल रही है। उन्हें भी बधाई और उनकीकैबिनेट को भी। साथ ही मुल् के हर उस नागरिक को, जो दुनिया के किसी भीकौने में इस विशिष् पहचान का लाभ पाने का हकदार होगा। लेकिन इतना हीनहीं, अर्थव्यवस्था से जुडे इससे भी कडे फैसले करने की जरूरत है। ताकि देशको लगे कि हमारे प्रधानमंत्री की पूरे विश् में बतौर अर्थशास्त्री जो पहचान है, वह यूं ही नहीं है। चाहे वो बेलगाम महंगाई का मसला हो या फिर कृषि बैंकिंग क्षेत्र पर सरकारी नियंत्रण का।आज इन सभी मसलों पर सधे हुए कदम उठाने की जरूरत है। ‍ ‍ ‍‍‍ ‍ ‍ ‍‍ ‍‍

Sunday, June 20, 2010

उससे भी बडी त्रासदी यह है...



मेरी तो पैदाइश ही भोपास गैस त्रासदी के एक वर्ष बाद की है। लेकिन इतिहास के काले पन्‍नों से मैंने जितना इस भीषण गैस काण्‍ड के बारे में समझा, शायद वह काफी है। दुनिया की इस सबसे बडी गैस त्रासदी से भी बडी त्रासदी आज के परिप्रेक्ष्‍य में यदि कोई है तो वह है हमारी राजनीति। जिसकी बदौलत हजारों मौतों का गुनाहगार राजकीय सम्‍मान के साथ उसी वक्‍़त विदा कर दिया गया। वारेन एंडरसन के मामले में जितनी लापरवाही तत्‍कालीन सरकार ने बरती, उतनी ही शायद नौकरशाही ने भी। तो क्‍या भारतीय दण्‍ड संहिता की धारा 120 बी के तहत इन लोगों का कोई अपराध नहीं बनता। यदि बनता है तो फिर सरकार चुप क्‍यों है। आज नहीं तो कल जनता को जवाब तो देना ही होगा। चाहे सरकार दें या फिर पर्दे के पीछे से उसे चलानी वाली समानान्‍तर सरकार। गुनाहगार इकलौती यही सरकार नहीं है, वह सभी सरकारें इस दोष से मुक्‍त नहीं हो सकती, जिन्‍होंने इस पूरे मामले पर मौनव्रत धारण किए रखा।

Thursday, June 17, 2010

कहां जा रहे हैं हम...

यह चित्र देखें.... आपको सामान्‍य सा ही लगेगा। मुझे भी लगा था। पर हकीकत यह है कि यह चित्र हमारे आज को दर्शान के लिए काफी है। हम किस ओर जा रहे हैं। इसका जवाब आप खुद इसमें ढूंढ सकते हैं। मां को अपने कलेजे के टुकडे से ज्‍यादा फिक्र शायद अपने पालतू कुत्‍ते की है। मन नहीं चाहता था कि इस चित्र को सबको दिखाउं। लेकिन बाद में सोचा कि इसे दिखाना जरूरी है। क्‍योंकि हकीकत पर यदि पर्दा रखा तो मैं भी उतना ही गुनहगार होउंगा, जितना कि ये मां है। आप देखें और मुझे अपनी टिप्‍पणी जरूर दें।

Saturday, May 15, 2010

ताउम्र याद रहेंगे वो लम्हे...

जनवरी 2009 का वो दिन मैं कभी नहीं भुला सकता। दिवंगत पूर्व उप राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत एक निजी यात्रा पर बूंदी आए थे। एक पत्रकार के नाते मैं उनसे मिलने उम्‍मेद बाग पहुंचा, बाबो सा से मैंने काफी देर तक बात की। इतने बडे कद की किसी शख्सियत को इतना सहज मैंने तो पहली बार ही देखा था। संवाद के दौरान ही जब अंत में मैंने अपना परिचय दिया तो राजस्‍थान पत्रिका का नाम सुन उन्‍होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और फिर मुझसे मेरे बारे में पूछना शुरू कर दिया। आज बाबोसा हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके साथ बिताए उन चंद लम्‍हों को मैं ताउम्र नहीं भुला सकता।

Thursday, May 6, 2010

राजनीति की चपेट में बचपन...

कोटा में भाजपा की एक रैली के दोरान यह द्रश्य रोचक रहा. एक माँ ने अपने लाल को पार्टी के झंडे पे ही सुला दिया